(Chronicle note: Dr. Panjab Singh left the position of VC at BHU on May 03, 2008. A detailed article is published elsewhere in this chronicle issue. To read this article, you might have to install hindi fonts)
वाराणसी। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. पंजाब सिंह शुक्रवार को बीएचयू से विदा हुए। स्वतंत्रता भवन में आयोजित भव्य विदाई समारोह में सभी भावुक से लगे। स्वयं कुलपति भी अपने को संयत करते नजर आए। लगभग दो घंटे तक चले समारोह में अनेक बार ऐसे अवसर आए जब लोगों की आंखें नम हो गईं। कुलपति को माला पहनाते वक्त सभी के चेहरे पर मुस्कान थी पर इसमें छिपा था बिछोह का दर्द भी। सभी पूरी तन्मयता से कुलपति के एक-एक शब्दों को स्मृतियों में बसा लेना चाहते थे। प्रो. सिंह ने इस मौके पर कहा कि महामना की इस थाती को सभी लोगों को मिलकर सहेजना होगा। यह महज एक विश्वविद्यालय ही नहीं बल्कि देश व संस्कृति की आत्मा भी है। यह जितनी समृद्ध होगी समाज व देश भी उतना ही समृद्ध होगा।
सभागार में बैठे लोग कुलपति के तीन वर्ष की उपलब्धियों की चर्चा भी करते रहे। समारोह में वाणिज्य संकाय को शोध छात्र ब्रजेश तिवारी, बसंत कन्या महाविद्यालय की डॉ. राधा बनर्जी ने अभिनंदन पत्र पढ़ा। कुलसचिव एन सुंदरम, कार्यकारिणी के सदस्य प्रो. एके बनर्जी, प्रो. टीवी रामकृष्णन प्रो. आनंद मोहन आदि ने संस्मरण सुनाए तथा कुलपति की दूरदर्शिता की सराहना की। संस्थानों के निदेशकों, संकाय प्रमुखों व संबद्ध महाविद्यालयों से आए शिक्षकों ने भी कुलपति का अभिनंदन किया। अभिनंदन का आलम यह था कि इस मौके पर कुलपति को 50 से अधिक स्मृति चिह्न मिले। विश्वविद्यालय की प्रथम महिला श्रीमती कमला सिंह का भी अभिनंदन किया गया। डॉ. पद्मिनी रवींद्रनाथ ने प्रो. पंजाब सिंह का जीवन परिचय पढ़। संचालन डॉ. जीएन तिवारी ने किया। इस मौके पर कायकारिणी सदस्य डॉ. एसडी सिंह, प्रो. एसएन उपाध्याय, प्रो. गजेंद्र सिंह, प्रो. शिवराज सिंह, प्रो. वीके कुमरा, प्रो. एसके सिंह, प्रो. राजकुमार, डॉ. प्रदीप श्रीवास्तव, पराग प्रकाश, डॉ. केपी उपाध्याय सहित काफी संख्या में शिक्षक व कर्मचारी उपस्थित थे।
न ऐेसा देखा न सुना
वाराणसी: 47 वर्षो तक बीएचयू से जुड़े रहे वरिष्ठ प्रोफेसर व विशेष कार्याधिकारी प्रो. ओंकार सिंह विदाई के इस मौके पर बेहद भावुक हो गए। बोले अपने जीवन में मैंने अनेक कुलपति देखे। इससे पहले विश्वविद्यालय में न तो इस तरह से किसी कुलपति की विदाई देखी गई और न ही सुनी गई।

